नोटबंदी / नए बड़े नोट अब पुरानों से ज्यादा, कब और कैसे रुकेगा कालाधन?

नवंबर 2018 में नोटबंदी को दो साल पूरे होने जा रहे हैं। सरकार और भाजपा नोटबंदी को सबसे बड़ा और अच्छा कदम बता रही है, जबकि आर्थिक विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि इतना बड़ा पहाड़ खोदने के बाद भी क्या मिला | और भी कई सवाल हैं। इन्हीं सवालों के जवाब हम सब जानना चाहेंगे | जानिए आखिर नोटबंदी से देश, सरकार, अर्थव्यवस्था और आम आदमी को क्या मिला? क्या उम्मीद के अनुसार ब्लैकमनी पकड़ी गई? क्या नकली नोटों पर लगाम लगी?

500 और 1000 के नोटों को हटाने का बड़ा मकसद कालेधन और नोटों की जमाखोरी पर लगाम लगाना था। नोटबंदी के बाद जारी हुए 2000 के नोटों की संख्या मार्च 2017 तक 328.5 करोड़ थी। इनका मूल्य 6 लाख 57 हजार करोड़ रुपए होता। देखा जाए तो यह आंकड़ा नोटबंदी के दौरान सर्कुलेशन में मौजूद 1000 रुपए के नोटों के मूल्य 6.32 लाख करोड़ रुपए से कहीं ज्यादा है। सरकार कहती है कि बड़े नोटों से कालाधन बढ़ता है। फिर पुराने हजार के नोटों से ज्यादा कीमत के दो हजार के नोट जारी करने से कालाधन कम कैसे हो गया?

इसके अलावा नोटबंदी के वक्त कुल करंसी में 500 और 1000 रुपए के नोटों की हिस्सेदारी 86 फीसदी थी, नोटबंदी के अगले साल यानी दिसंबर 2017 में 500 और 2000 के नोटों की हिस्सेदारी 90 फीसदी से ऊपर चली गई। यहां सवाल उठता है कि आखिर बड़े नोट पहले से ज्यादा ही जारी करने थे तो फिर नोटबंदी का मकसद क्या था? क्या 2000 के नोट से कालेधन को बढ़ावा नहीं मिला?

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